Thursday, June 11, 2015

थक गया हूँ मैं...

थक गया हूँ मैं कि अब सोने को जी चाहता है,
दूर तलक फैली इस तन्हाई में सिमट जाने को जी चाहता  है,

कंपकंपाती हुई भूली बिसरी यादों के घरोंदे को,
अबकी बारिश में जलाने को जी चाहता है,

मुद्दत हो गयी इक़ राह पर चलते चलते,
कि अब पैरों पर पड़े निशानों को रेत से मिटाने को जी चाहता है,

तिनके तिनके जुड़ के बने इस उम्मीद के सेहरा को,
आज़ ख्वाबों के सूखे दरिया में बहाने को जी चाहता है,

थक गया हूँ मैं कि अब सोने को जी चाहता है,
रात के उजाले में आज फिर से खो जाने को जी चाहता है ।